नई दिल्ली। अगर किसी को लगता है कि केवल व्हाट्सएप या एसएमएस पर हुई बहस के आधार पर किसी वैवाहिक रिश्ते को कानूनी तौर पर खत्म किया जा सकता है, तो Bombay High Court का हालिया फैसला इस धारणा को गलत साबित करता है। हाई कोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि महज व्हाट्सएप चैट को आधार बनाकर तलाक नहीं दिया जा सकता। अदालत ने Nashik Family Court के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी के व्हाट्सएप संदेशों में कथित क्रूरता के आधार पर पति को तलाक दे दिया गया था।
फैमिली कोर्ट ने दिया था एकतरफा फैसला
यह मामला Hindu Marriage Act 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक से जुड़ा है। नासिक फैमिली कोर्ट ने मई 2025 में सुनवाई के दौरान केवल व्हाट्सएप और एसएमएस चैट्स को आधार बनाकर पति के पक्ष में फैसला सुना दिया था। यह मामला एकतरफा चल रहा था, इसलिए अदालत ने पति की गवाही को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लिया। पत्नी को अपना पक्ष रखने या सुनवाई में शामिल होने का अवसर नहीं दिया गया था।
पति ने लगाए थे मानसिक प्रताड़ना के आरोप
पति ने अदालत में दावा किया था कि उसकी पत्नी उसे और उसके परिवार को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी। पेश की गई चैट्स के आधार पर कहा गया कि पत्नी बार-बार नासिक छोड़कर पुणे शिफ्ट होने की जिद कर रही थी और सास-ससुर के साथ रहने से इनकार कर रही थी। इसके अलावा, पत्नी पर सास और ननद के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने, भावनात्मक दबाव बनाने और पति को ब्लैकमेल करने के आरोप भी लगाए गए थे। इन आरोपों को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट ने तलाक की मंजूरी दे दी थी।
हाई कोर्ट ने कहा—केवल चैट पर्याप्त सबूत नहीं
जब इस फैसले को चुनौती दी गई, तो Bombay High Court की जस्टिस Bharati Dangre और जस्टिस Manjusha Deshpande की पीठ ने 27 फरवरी को इसे खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केवल व्हाट्सएप चैट्स के आधार पर तलाक जैसा गंभीर फैसला नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब उन्हें विधिवत साक्ष्य के रूप में पेश ही नहीं किया गया हो।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता साबित करने के लिए ठोस सबूत और गवाहों की जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) आवश्यक है। इसके साथ ही अदालत ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए नासिक फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया है, ताकि दोनों पक्षों को अपने-अपने सबूत पेश करने और तर्क रखने का पूरा अवसर मिल सके।